| मना! चल रे चल जाऊ झडकरी |
| मना! चल रे चल जाऊ झडकरी |
| पाहु जगदंबा मनोहरी |
| अष्टभुजांकित शोभे कमळावरि |
| किरिट कुंडले तेज मुखावरी |
| मुसळ आणि घंटा शोभे करि |
| गांव वाकी पाटली तोडे चुडे बिलवरी |
| अंगव्या मुध्या ही सर्व बोटावरी |
| बिंदी बिजवरा कानि कर्ण भुषणे |
| नाकि नथ हिरयांनी चमके फार |
| माळि मळवट केशर कस्तुरी |
| कुंकुम हळिद्रा नाक्षिदार |
| डोळियांचे कडा काजळ रेखिले |
| सिंदुराची रेखा भागावर |
| ल्यालि शालु हिरवा चोळी बुहेदार |
| स्वर्ण मेखलाहि दिसे कटिवर |
| पुतळि माळ तन्मणि हुशि साज गळसरी |
| शोभे मोहनमाळा गळाभर |
| एक मांडी घालुन सव्य चरण खाली |
| नुपुर पैजंण वाळे तोडे त्यावरी |
| चरणांचे बोटी विरोधा जोडवी |
| मासोळया नी वळे अंगठयावरी |
| श्रीमुख सुंदर हास्य मुखावर |
| भूषणे सुरेख सर्वांगावरी |
| गळा पुष्पहार सर्वांगि संसारी |
| शोभा देती गजरे सर्व करि |
| ऐसि जगदंबा पाहु डोळाभरी |
| चरणि लीन होउ वारंवार |
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| आजवर तुज पुजिले तुज नित्य स्मरलो मी तुला |
| आजवर तुज पुजिले तुज नित्य स्मरलो मी तुला |
| हेच का फळ मग तयाला? कां प्रेम पान्हा आटला? |
| ठरवितो मी ऐक, करविसि तूं दुजे की त्यावरी |
| अल्पबुध्दि मज न समजं, तव तयातील योजना |
| योग्य जे, जे मम हिताचे मजसि ज्ञान न कल्पना |
| नित्य राहि शुध्द बुध्दि मी न वावगे वागलो |
| अनुभुति मज येई उलटी मी न कारण समजलो |
| तुजवरी मम भाव दृढ, मज रक्षिसि तूं संकटी |
| संकटे परि नित्य येति येतिती ती नच एकटी |
| कां घडे हे नित्य नियमित हेच कोडे मज पडे |
| तव कृपे मजसी तयातहि मार्ग अवचित सांपडे |
| मज न समजे का सदोदित येति मजवर आपदा? |
| ढळविते मम ध्यान तव पदि, रुष्ट होता संपदा |
| ऐक आहे विनवणी मम मान्य तूं करशिल ना? |
| तव पदि मम लक्ष लागो हे तरी बघशिल ना? |
| तव रुकारावरति आहे जीव हा बघ टांगला |
| प्रेमपान्हा संपता तव मार्ग ही मम खुंटला |
| जे मनि भम येई माझया सर्व मी कथितो तुला |
| तूच माझि माउली तुज रक्षीणे वेडवा मुला |