| क्षणभंगुर हे जीवन येथील अळवावरचे पाणी |
| क्षणभंगुर हे जीवन येथील अळवावरचे पाणी |
| टाकुनी जाणे इथेच इथली धडपड संपवुनि |
| ठेव सदा तू जाणिव याची नकोच गुंतू येथ |
| स्मर जगदंबा रात्रदिन मनि देईल भवपथि साथ |
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| सुखात सामिल सर्व सोबती आपत्काळी न कोण |
| देव आठवे त्यावेळी मग जाता धन स्त्री मान |
| विचार हयास्तव करि तूं पुरता हो सावध तात्काळ |
| जगदंबापद धडि धडि स्मर तूं विरेल मायाजाळ |
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| बाल्य हरविले क्रिडेमाजी यौवनी धन स्त्री मस्ती |
| प्रौढपणि तनु हो दुर्बळ परि प्रपंचात आसक्ति |
| हारजित ही लटकी येथिल कशास होसी उदास |
| प्रपंच खेळा ऐसा, श्रीपदी नित्य असावी आस |
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| कुलस्वामिनी श्रीजगंदबा पुत्रावत्सल खास |
| रंगुनि नामी अंतर्यामी तिचाच असु दे ध्यास |
| न लगे पूजन अर्चना तिजला यज्ञ याग सायास |
| शुध्द भाव मन शुध्द आचरणि प्रीति तिथेची खास |
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| कृतज्ञाने शरण तिला जा जिंकि तिथेच प्रेम |
| परिस लागता लोहासी मग का न होई ते हेम? |
| कृपा तिथेची होता जाईल तुझे जिणे उजळुन |
| हवी मात्र तव असीम भक्ति देहभान विसरून |
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| राग-भैरवी, ताल-नाटकी त्रिताल चाल-आई आम्हा आठवशिल ना ? |
| शरण तुला मी करि मज पावन |
| पथ चुकले लेकरु । भगवती! नकोच मजसी अव्हेरू |
| मला न माहित कवण्या रीती |
| तव पूजन मी करू । भगवती !........... |
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| मंत्र तंत्र शास्त्रोक्त पुजाविधि |
| कसे करू? मन मज न बुध्दि |
| वय बहु गेले उरे न अवधि |
| धीर कैसा मी धरू । भगवती!............... |
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| यज्ञ, याग बहु ब्राम्हण भोजन |
| कसे करवु मी जवळि मुळि न धन |
| कृपा कशी तव करू संपादन? |
| नको उपेक्षा करू । भगवती!............... |
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| दीन पतित मी बहु अपराधी |
| कुलस्वामिनी परि तूं उदारधी |
| अव्हेरील का माता जर कधी |
| पथ चुकले लेकरु । भगवती!............... |
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| दावू कशी मम मनिची तळमळ |
| तूझया कृपेस्तव हृदय उताविळ |
| जगज्जननी तूं उदार प्रेमळ |
| आर्जव कितीदा करू । भगवती!............ |
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