| भाग 2 ला संसारसार |
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| (चाल आरती भुवन सुंदराची ०) |
| आरती त्रिपुरसुंदरीची । भुवनेश्रवरी अंबिकेची ।। ध्रु०।। |
| अंबे तुझी रम्य मूर्ति । कमळासनीं विराज ती |
| अष्टायुधें अष्ट हस्तीं । दिव्य सुख कमळाची दीप्ती । |
| स्वंयभू स्व्यें म़ूर्ति धारी । भक्त वरदान । दक्ष तूं तूर्ण |
| नाहिं उपमान । कल्प वृक्षाधिक तूं साची । भुवनेश्रवरी ०।।१।। |
| रम्य हें भूविवरस्थान । कल्पिला वास तुवां पूर्ण |
| भक्त कामना कामधेनू । वससी अंबे तूं सगुण |
| रोग आपत्ति हरिसि सारी । नित्य कल्याण । करिसि तूं पूर्ण |
| नाहिं अनुमान । प्रत्यक्षता अनुभवाची ।। भुवने ०।।२।। |
| आनंदविसि भक्त वृंदा । लागति सुरनर तव छंदा |
| भक्ति दे सात्विक मतिमंदा । शंकरा सेववि आनंदा । |
| अर्चनी लावि सदा गोडी । भवाब्धी पतित । प्रार्थितो सतत |
| उध्दरी त्वरित । माय तूं असशी सर्वांची ।। भुवने ०।।३।। |
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