| भाग 2 ला संसारसार |
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| १ |
| (चाल धाडुनि दिधले दासी) |
| क्षणभरि येई वीट मनाला विषयी रत होतां । |
| वैराग्याचा अंकुर उपजे मनुजाच्या चित्ता । |
| सार न काही वाटे तेव्हा विष्यांच्या ठायीं । |
| स्तब्ध्पणा हा भोगक्लेशें ठाकतसे हृदयीं । |
| अंतकरणीं उमीं उठते वैराग्याची ही ।।१।। |
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| २ |
| (चाल भूपती खरे ते वैभव) |
| हा व्याप नको संताप वाढवी भारी |
| राहुनी मिळेना सुख गृहसुत परिवारीं । |
| संसार नको हा कष्ट फार तो देई । |
| तें बरें राहणें फटिंग होउनि पाही । |
| एकटया जिवाचा त्रास पडे तो काय । |
| वन बरें नको घर कष्ट सोसिना देह ।। |
| वन बरें नको घर कष्ट सोसिना देह ।। |
| (चाल) म्हणतील आप्त ते काय मज तरी |
| हा संसाराला भ्याला बहुपरी। |
| नेभळा खुळा हा झाला कां तरी |
| अभिमान उठे हा काय करावें आतां |
| न सुचे मज कांही सौख्य कसें ये हाता । |
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| ३ |
| (चाल निर्धनतेनें लज्जा उपजे) |
| वैराग्याने प्रकाश पडतो मनुजाच्या अंतरीं । येई विचार तो क्षणभरी ।।१।। |
| सार असारा निवडायाची बुध्दी उपजे बरी । बुडतां नित्य मोहसागरीं ।।२।। |
| सदबुध्दीनें सुविचाराचा उदय होय अंतरीं । ऐसी परंपरा ही खरी ।।३।। |
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