| भाग 3 रा , निवेदन |
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| आहेच सांप्रत खरें जग हें अशाचे |
| श्लोक |
| ठेवी न जो विधिनीषेध विकल्प कांहीं |
| दावी जगास अवडंबर सर्व पाही। |
| वागे शुभाशुभ गणी न कधी कशाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें अशाचे ।।१।। |
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| विदया धनादिक जरी बहु अल्प होई |
| दावी जगास तरिं पंडितता बढाई |
| जो नित्य कीर्तन करी स्वमुखें यशाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें अशाचे ।।२।। |
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| झाला खरोखर जरी अपमान थोर |
| दावी जगास निज गौरवसा समोर |
| शब्दावडंबर जगा भुलवी जयाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें तयाचे ।।३।। |
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| शिष्टापरी मिरवणें जगि दर्पयुक्त |
| गोष्टी बडया इतर तुच्छ वदे असत्य |
| शब्दक्रिया मन विभिन्न सदा जयाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें तयाचे ।।४।। |
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| जो वाढवी निजमहत्त्व मुखें स्वयेंच |
| लोकीं फुगे स्वकॄतिनेच वदे न साच। |
| मी मी करोनि मिरवी बळ जो यशाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें अशाचे ।।५।। |
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| मानूनि अंध जनता मिरवी प्रकाश |
| ज्ञाता धनी विपुलकीर्ति असा जनास। |
| ना पापपुण्य भय लेश मनीं जयाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें तयाचे ।।६।। |
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| ज्या ध्येय कीं स्वहीत हेंच न अन्य कांही |
| दावी परार्थपटुता परि सर्वदा ही । |
| शब्दिक्रया भुरळ घालि जना जयाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें तयाचे ।।७।। |
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| मी कोण कोठिल शिवे न कधीं विचार |
| सर्व स्वतंत्र जगिं मीच न अन्य थोर । |
| सत्ता वसे अशि अगाध मनीं जयाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें तयाचे ।।८।। |
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| जातील दोन दिन हे चिरकाल नाहीं |
| आयुष्य हें घडि धडी खपते न राही । |
| ऐसा विचार वरि चित्त न हें जयाचे |
| आहेच सांप्रत खरें जग हें तयाचे ।।९।। |
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| ऐशा कृतार्थ पुरुषा दुरुनी नमावें |
| ज्याची स्वयंकृति अशीं जगतीं न मावे । |
| आहेच सांप्रत जरी जग हें तयाचे |
| लाभो तयास पुरवो तरि हेत याचे ।।१०।। |
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| माते तुझ्या चरणिं आश्रय देसि आम्हा |
| तेणेंच नित्य मनिं तुष्टि घडे प्रकामा । |
| लागों तुझ्या भजानि हें न साच नित्य |
| याहून अन्य जगदंब न मदीय चित्त ।।११।। |
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| चालो सदा जगिं अनन्वित कारभार |
| खोटें खरें अशुभ वा शुभ हा प्रकार । |
| आम्हां त्वदीय पदपंकज हेंच सार |
| राहूं निरिच्छ बनुनी न दुजा विचार ।।१२।। |
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| सर्वस्व तूं अमुचें जगदंब माते |
| आम्ही तुझे नित्य शिशूच दुजें न नातें । |
| वाटो कसहि गुणहीन सदा जना मी |
| तू् माय एक करिशी मम चोज नामी ।।१३।। |
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| उत्संगवर्ति शिशु मी तव विश्र्व माते |
| त्वप्रेम पूर्ण निरपेक्ष तुझया जनाते । |
| निर्धार हा धरुनि वागतसे जनांत |
| जाणो कसा कुटिल हा व्यवहार येथ ।।१४।। |
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| नारायणि त्रिपुरसुंदरि विश्रमात |
| र्बाले शिवे परशिवे अयि शंभुकांते । |
| अंबे जगज्जननि मां परिपाहि नित्यं |
| इत्थं स्मरत्वनिशमेव मदीयचित्तं ।।१५।। |
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| जावो क्षणक्षण तुझया स्मरणांत माझा |
| पाहूं तुझयाच पदिं चित्त समस्त काजा । |
| कर्तव्य काय मज तें मग या जगाचें |
| राहों कसेंहि मग तें जग हें अशाचे ।।१६।। |
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| ओम तत्सत |
| श्री जगदंबा प्रीयताम |