| भाग 3 रा , निवेदन |
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| श्लोक |
| जी जी परिस्थीती घडे समयानुसार |
| ती सर्व संमत तुला न दुजा विचार। |
| त्यांतील सर्व सुख दुख तुझें म्हणोनी |
| स्वीकारितों जननि मी हृदयीं गणोनी ।।१।। |
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| जें जें स्थलांतर मला घडलें घडेल |
| तें सूत्र चालन तुझ्या पदरी जडेल |
| हेतू विशिष्ट नुमजे तव माय आधीं |
| माझें अजाणपण हें मज नित्य बाधीं ।।२।। |
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| अंती सुखावह घडेल जसें मला कीं |
| तें तेच तूं घडवीशी मज लागीं लोकीं । |
| त्यांतील दुख सुख जें मज भासतें तें |
| माते मदल्पमतिला न कळोनि येते ।।३।। |
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| तूं दूरदर्शि जननी तुज कां कळेना |
| मी अल्पबुध्दि मजला मन आकळेना । |
| तात्कालिक क्षणसुखा वश होय चित्त |
| त्या इष्ट तें घडविण्या करि यत्न नित्य ।।४।। |
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| तात्काळ जें सुख न तें सुख सर्वकाळीं |
| तैसेचं दुख न गमे स्थिर अन्य वेळीं । |
| जें भासतेंच सुख दुख मनास सारे |
| त्या कालचक्र फिरवी विविध प्रकारें ।।५।। |
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| माझे मनास न कळे सुखदुख कांहीं |
| तें कांक्षितें सुखचि केवळ नित्य पाही । |
| वाटे तया सतत इष्ट तसें घडावें |
| जें त्या अनिष्टें न तसे पदरीं पडावें ।।६।। |
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| माझें हिताहित खरें मजला कळेना |
| हें चित्त चंचल सदा मज आकळेना । |
| माते तुझ्यावरि असे मम भार सारा |
| ठेवी मला तव गमेल जसे विचारा ।।७।। |
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| मी हीन दीन परि बाळक की तुझा गे |
| प्रेमार्द्र तूं जननि सारि तया न मागे। |
| इच्छा तुझी सतत मी शिरसा नमोनी |
| वागेन निर्भय असा वर दे भवानी ।।८।। |
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| माते तुझ्यावीण रिता न कुठेंच ठाव |
| सर्वस्थळीं विलसतो तव सुप्रभाव । |
| तूं नित्य संनिध म्हणोनि न भी कदा मी |
| तेणेंच सर्व गमतें मज नित्य नामी ।।९।। |
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| त्वत्सूत्र चालन सलील घडे तयातें |
| पाहूं कृतज्ञ मतिनें स्थीरचित्त माते |
| ठेवूं तुझें स्मरण नित्य हृदंतराळीं |
| राहूं तुझ्यांत अशि दे मति सर्वकाळीं ।।१०।। |
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