| भाग 2 ला संसारसार |
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| (चाल फुलें सुवासिक हीं) |
| आनंद स्थळ तें जीवा । आनंद स्थळ तें । सुखदुख संभ्रमीं |
| मोहुनि जाता कोठे नच मिळतें ।। आनंद ।।ध्रु०।। |
| या मानवदेही संसाराचा ठेवा । धनपुत्रगेहिनी गृहकीर्तीच्या हांवा । |
| निजकर्तृत्वाचा अहंभाव मिरवावा । यांतचि निजबळ तें वेंची यांतचि ०।। |
| वासना ओढिती जशा तसें ते । चंचल मन पळतें ।।आ०।।१।। |
| सव्दिवेक उपजा वैराग्याने राहो । या नश्र्वर लोकीं सार काय तें पाहो । |
| दृढ यत्न व्दारें भक्ति समागम पावो । जीवित सत्फळ तें यांतचि जीवित ०।। |
| का व्यर्थ असारी संसारी मन राहुनि तळमळते ।। आ०।।२।। |
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| २ |
| (चाल दों दिवसाची तनु हे साची) |
| क्षणात हसती क्षणात रडती क्षणांत चढती गर्वगिरी |
| क्षणात बुडती मोहसागरीं विचित्र लीला किती तरी ।।१।। |
| कनक कामिनी ध्येय ठेउनी अगाध यत्नीं तळमळती |
| गृहासंमानी गुंग होउनी सैरावैरा किती पळती ।।२।। |
| मानासाठी अपमानाची जोड साधिती कुणी किती |
| सौख्य मिळाया यातायाती कोणी रात्रदिन करिता ।।३।। |
| कैसें हाले सूत्र आपुलें खेळ खेळवी ऐसे कां |
| कोण आपणा न धरी कोणी ऐशा सुविवेका ।।४।। |
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| ३ |
| (चाल तें म्यां ब्रहम पाहिलें) |
| हीं कळसूत्री बाहुलीं । हीं कळसूत्री बाहुलीं |
| निजरंगीं किति दंग होउनी । मीपणिं सारा करिति पसारा |
| कशि पडलीं त्यां भुली । हीं कळ ०।।१।। |
| भोग न चुकता प्रारब्धाचे । निजकर्माच्या परिपाकाचे |
| फेरे घेती सुखदुखाचे । परि ममता बाणली ।। ही कळ०।।२।। |
| अहंपणाचा ताठा धरुनी । बावरती हीं सर्वाचरणीं |
| यांतें न गमे शास्ता कोणी । कशि माया बिंबली ।। हीं कळ ०।।३।। |
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| ४ |
| (चाल कामदा ) |
| कर्मबीज तें नष्ट होइना । सौख्यदुख तें ये क्षणक्षणा |
| केवि होय आनंद या जिवा । भक्ति वांचुनी नित्य तो नवा ।।१।। |
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| ५ |
| (चाल साकी ) |
| सदबुध्दीनें विवेक उपजी वैराग्ये बळ पावो |
| भक्ति सहायें सदुरूदर्शन होउनि कृतार्थ होवो |
| अंबापद भक्ती । जीवा आनंद प्राती ।।१।। |
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| ६ |
| (चाल त्यजि भक्ती साठी लाज) |
| किती सुंदर हा संसार मनिं फार बिंबुनि राही ।। ध्रु०।। |
| संपत्ति मनोरम कांता । नवमंदिर सुखसाधनता |
| बहु दासदासि सुतदुहिता । परिवार हा किती देई ।। किती ०।। |
| आमुच्या सुखास्तव सारा । हा जगतीं सर्व पसारा |
| अनियंत्रित या अधिकारी । हा चढवी सकळा पाही ।। किती ०।। |
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| ७ |
| (चाल किति वानुं बळ युवतीचें ) |
| संसार या जगिं केवळ येई नरदेहीं उदया ।। येई नर ०।। |
| पशुपक्ष्यादिक हीन बापुडे कैंचें ज्ञान तया |
| संसारी जरि सारीं। गढणारी । दिसति खरी |
| निजदेहधर्मा अनुसरुनी तीं आस्वादिती विषया ।। संसार ०।। |
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| ८ |
| (चाल पैशावांचुनि मौजा कैशा) |
| कनक कामिनी विश्रवमोहिनी निर्मुनि रचिली नरकाया |
| अहंपणाची अनुपम किल्ली दिधली तिजली गति द्याया ।।१।। |
| कामक्रोधादिक हे तत्पर अहंपणाला भ्रमवाया |
| आयुष्याची मर्यादा ही गुप्त ठेविली समजाया ।।२।। |
| सुमती कुमती जोड ठेविली विष्यी जीवा वळवाया |
| जोर चालतो कुमतीचा तो सुमती जाते ती वांया ।।३।। |
| सुविवेकाचें नांव कशाचें विषयाची गोडी भारी |
| कर्ता हर्ता सर्व एक मी हीच भावना जगिं सारी ।।४।। |
| खेळ मजेचा चालें साचा कनककामिनाच्या पायीं |
| विश्रांतीचे नांव नको तें धडपड ती चालू राही ।।५।। |
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| ९ |
| ( फुलें वेलीचीं । भूषणें तशीं युवतीचीं) |
| धन हें साचें । जो भोगिल होतें त्याचें ।। |
| एका ठायीं कधिं ना राही । चंचळ तें पळतें पाहीं । |
| कलहातें कारण होई । काय सुखाचें । माहेर होय कष्टाचें ।।धन ०।।१।। |
| परिवार हाहि कोणाचा । घेतलें दिलें तरि साचा |
| न पुसे तो वैरी त्याचा । सुखाला साचें । संकटीं कोण कामाचें ।।धन ०।।२।। |
| हा अहंपणाचा तोरा । चाले वपु तोंवरि सारा |
| मोहाचा पडतो मारा । डामडौलाचें । पोकळ घर अवघें त्यांचें ।। धन ०।।३।। |
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| १० |
| (चाल निर्धतेनें लज्जा उपजे) |
| संसाराची आवइ भारी मनुजाच्या अंतरीं । वाढे क्षणोक्षणीं किति तरी ।।१।। |
| माझें माझें धरूनी ओझें सर्वा ठायीं फिरें । जडलें पिशाच हें जणुं खरें ।।२।। |
| चंचल सारें क्षणभंगुर हें वाटेना कधीं मना । सोशी नानापरि यातना ।।३।। |
| मोहसागरीं बुडतां ऐशा सुटका कैशी घडे । माया दढतम आंगीं जडे ।।४।। |
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| ११ |
| (चाल परमार्थाचा हा) |
| छळिती या तॄष्णा जीवा नाना भवसागरी । भवसागरीं ।।छळिती ०।। |
| संसॄतिच्या लाटा भारी । उठता विकाराकारी । |
| सुखविति दुखविति परिवारीं । मोह अनावर वाढतसे । |
| सुटतें न मतिचें पिसें । गोंधळे मन अंतरीं ।। छळिती ०।। |
| अहंपणानें थारा न मिळे । सुविवेक तोहि गळे । |
| अहंपणानें चित्त चळे । स्वस्थ्पणा मुळिं ना कधीं । |
| छळिती सदा उपाधी । भ्रांतता जगिं ये पुरी ।। छळिती०।। |
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