| भाग 3 रा , निवेदन |
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| श्लोक |
| वाटे मला त्वरित लाभ अमूप व्हावा |
| जेणे समस्त ऋणभार लयास जावा । |
| येईल जैं तव मना जगदंब ऐसें |
| होईल सिध्द अवघे अकृत प्रयासें ।।१।। |
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| आहे मला भरवंसा दृढ हा जरी कीं |
| वाटे न धीर मन चंचल हें विलोकी।। |
| तेणें उतविळपणा घडतो सदाही |
| हा दोष सर्व मम घालवि तूंच पाही ।।२।। |
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| प्रातव्य जें मम असेल मिळेल खास |
| त्यालागिं कांही करणें नलगे प्रयास । |
| हें सर्व निश्चित तरी छळतेच आस |
| माते तिचा करि जगज्जननी निरास ।।३।। |
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| माझें मनोगत तुला अवघेंच ठावें |
| माझ्या मुखें तुजपुढें मग कां वदावें । |
| माझें हिताहित तुलाचि कळें समस्त |
| माते करी तुज गमेल जसें प्रशस्त ।।४।। |
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| मी अज्ञ बालक तुझें जननी मदीय |
| तूं सर्वथा तुजवीणें मज न स्वकीय । |
| तूं काळजी निशिदिनीं धरितेस माझी |
| राखी मला सतत गे जगदंब राजी ।।५।। |
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| जें जें मना मज गमे कथितों तुला तें |
| तूं माय मी शीशु तुझा सुखवी मुलातें । |
| माते तुला मजमुळें जरि होय कष्ट |
| प्रेमार्द्र तूं म्हणुनि होसि कधीं न रुष्ट ।।६।। |
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| माझ्याकडोनि न घडे तव कांहि सेवा |
| तूं नित्यशुध्द असशी करीशी न हेवा |
| वात्सल्य थोर तुलना न तयास कांहीं |
| मभ्द्राग्य थोर गमते जननी मला ही ।।७।। |
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| मी थोर पूर्व सुकुतें पदरी तुझ्या गे |
| आलों जगज्जननि सारि तया न मागें । |
| वेडा खुळा परि तुझा सुत मी म्हणोनी |
| राखी मला न करि दुर असा गणोनी ।।८।। |
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| हें प्रार्थनाष्टक तुझ्या चरणीं अनन्य |
| भावें समर्पुनि तुझा म्हणवीन धन्य। |
| माते जगज्जननि पूर्ण कटाक्षीं |
| ठेवूनि तूं मजसि हें जगदंब रक्षी ।।९।। |
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