 |
|
| |
|
| राग-हंसध्वनी ताल नाटकी त्रिताल |
| ध्यास लागला मला निरंतर |
| भेटवा अंबिका माउली |
| कल्पवतरुची साउली मला |
| भेटवा अंबिका माउली ।। धृ० ।। |
 |
| स्थान स्वयंभू देविभोयरे |
| माहुरगटची मूर्त अवतरे |
| धर्ममयीश्ववर सिंह रूप रे |
| मूर्ता स्थामपन केली ।।१।। |
 |
| अष्टचभुजांकित रुप ती कमलासन |
| घंटा हल शर चाप सुदर्शन |
| शंख शुल भुसलादि घेउन |
| हसतमुखाने आली ।।२।। |
 |
| सोनसळीचा शालु भर्जरी |
| हिरवी चोळी काठ केशरी |
| किरिट कुंडल रत्नांघकित करि |
| गोठवाकी पाटली ।।३।। |
 |
| बिंदी बिजवरा मोती पोवळी |
| कर्ण भुषणे नयनी झळाली |
| हळदि कुंकूम केशर भाळी |
| कस्तुरी काजळ डोळी ।।४।। |
 |
| मोहनमाळा ठुशी गळसरी |
| साज तन्मणी पुतळया हारी |
| पायी जोडवी पैंजण नुपुरी |
| रत्न मेखला ल्याली ।।५।। |
 |
| जाई जुई शेवंती मोगरे |
| झेंडु चाफा भरले हारे |
| माळा गुंफू करुया गजरे |
| वाडी फुलांची केली ।।६।। |
 |
| मांडा रंगित पाट चंदनी |
| ताट चांदीचे रांगुळी रेखुनि |
| पुरणपोळीही किती निगुतीनी |
| पक्वाने बहु केली ।।७।। |
 |
| केले तांबुल तबक सजवले |
| खण भर्जरीचे चुंडे अणविले |
| ओटी नारळ अहेव लेणी |
| प्रेमे अर्पण केली ।।८।। |
 |
| धूप सुगंधी दीप उजळुनी |
| करू आरती स्तवने गाउली |
| भावभक्तिच्या स्तुतीपाठांनी |
| आनंदी अंबा झाली ।।९।। |
 |
| प्रसन्न होता अंबा प्रेमळ |
| रुप पहाता मन हो निर्मळ |
| दॄढतर होई भावभक्ति बळ |
| वॄत्ती सात्विक झाली।।१०।। |
 |
| तुला पुजावे ध्यावे गावे |
| नामस्मरणी रंगुनि जावे |
| यज्ञयागीतव नित्या रमावे |
| इच्छा मी बहु केली ।।११।। |
 |
| हीच आस गे मम अंतरिची |
| आवड लागो तव चरणांची |
| पुण्याई मम तव चरणांची |
| आज फळाला आली ।।१२।। |
|
| |
| राग-खमाज ताल नाटकी त्रिताल चाल मी मज हरपुनि बसले ग! |
| जय जगदंब दयाधन देवी, करुणाकारी तूं पावे |
| धवल तुझं यश आनंदाने, रात्रदिन मी गावे |
| व्यवसायाच्या नित्याववर्ति, पुरता मी हा फसलो |
| सुख दुखाच्याय दुर्गम संभ्रमी, घडि घडि मी सापडलो |
| अनुसंघाने तुझ्याच अंबे, नित्य सुखी मी झालो |
| अपुनि ओंजळ सुख दु:खाची, मी तव चरणी रमलो |
| कितिदा अंबे तुवा रक्षिले, असता मी संकटी |
| अतराई तव कसा होउ मी, प्रेममये शेवटी |
| तु माता मम, बालक मी तव, सांभळि निजभावे |
| हेच मागणे तव चरणांना, कधी न मी विसरावे |
| करिता पूजन कृतज्ञतेने, रंगुनिया मी जावे |
| धवल तुझ यश शुध्द मनाने, दिनरात्री मी गावे |
|
|
| राग-मिश्र मांड ताल दादराचाल -घडि घडि घडि चरण तुझे आठविते राया |
| उदयोडस्तु जगदंबे जगदीश्वरी अंबे |
| करुणाकरी कमलेश्वमरी ये तू अविलंबे |
| जय दुर्गे सर्वेश्वरी मुळी न मज विसंबे |
| सन्निध मम राहि सदा जय जय जगदंबे ।।१।। |
| |
| उदय तुझा होता मनि तुजसी मी पहावे |
| घडि घडि तव स्ममरणी मी रंगुनिया जावे |
| अर्चनि वा किर्तनी वा भजनि मी रमावे |
| जगदंबे सन्निध मम नित्य तू असावे ।।२।। |
| |
| अशनि शयनि स्व्प्नि मनी छंदि तव असावे |
| नामस्मयरणात तुझे दर्शन मज व्हावे |
| सर्वव्यापी रूप तुझे मज प्रतीत व्हावे |
| जगदंबे सन्निध मम नित्ये तू असावे ।।३।। |
| |
| रात्रदिन ध्यास तुझी घडो चरणसेवा |
| विसर तुझ्या चरणांचा मज कधी न व्हावा |
| रंगुनि रंगात तुझया विऊनी मी नुरावे |
| जगदंबे सन्निध मम नित्यी तू असावे ।।४।। |
| |
| माय बाप बंधू आप्त सखे सोयरे ये |
| बंधने तुझीचे तूच तोडी आदिमाये |
| सर्व स्थळी रूप तुझे स्वामिनी पहावे |
| जगदंबे सन्निध मम नित्यद तू असावे ।।५।। |
| |
| तु माया आदिशक्ति श्री मा उमा गे |
| तु अनदि तुन न अंत विश्व्माउली गे |
| तू धात्री तू कर्ति भवतारक व्हावे |
| देवूनि पदि ठाव मजसी आत्मरूप द्यावे |
| जगदंबे सन्निध तव नित्य मी असावे |
| जगदंबे सन्निध मम नित्य तू असावे ।।६।। |
|
| |
| रंगरेखा रेखुनी मी भावरेखा रेखिते |
| अंतरी तव रूप अंबे नाम वदनी राहु दे |
| सर्वकाळी नामगानी नामगोडी जोडी दे ।।धॄ।। |
| |
| छंद नामाला जडावा भावभक्ति दृढ करी |
| होउ दे व्यवहार सारे, तू वसावे अंतरी |
| सर्वसाक्षी अंबिके मज, चुकुनि मजसि चुकू न दे |
| सर्वकाळी नामगानी नामगोडी जोडी दे ।।१।। |
| |
| दे कुणा अधिकार कोणा राज्य दे धनसंपदा |
| संतती, सुख, सौख्य, शांति, मोक्ष, मुक्ति दे पदा |
| मजसि दे परी वास चरणी, स्मरण अंति होउ दे |
| सर्वकाळी नामगानी नामगोडी जोडी दे ।।२।। |
| |
| मज न ठावे स्तवन पुजन कवण रिति तव करु? |
| ज्ञान ना मज भाव भक्ति मी तुझे परि लेकरु |
| स्वामिनी तू मम कुळाची, कणव तुजला येउ दे |
| सर्वकाळी नामगानी नामगोडी जोडी दे।।३।। |
| |
| तुजासी जैसे योग्य वाटे, ठेवि मजला तू तसे |
| मी न मागो तुजसि काही, न्यून मम तुज कळतसे |
| अंतरी ओंसडुनि मम, शांती तॄप्ती वाहू दे |
| सर्वकाळी नामगानी नामगोडी जोडी दे ।।४।। |
| |
| माझिया मनिचे मनोगत, तुजसि ठावे अंबिके |
| मम हिताहित तुजसि कळते, रक्षि मज जगदंबिके |
| दे पदि मज ठाव माते, अंबिके करूणास्पदे |
| सर्वकाळी नामगानी नामगोडी जोडी दे ।।५।। |
| |
|
| |
|
| |
|
|
 |
 |
| |
 |
| एका जनार्दनी (Ebook) |
| |
 |
| कोल्हापुर (महालक्ष्मी) |
 |
| तूळजापुर (भवानीमाता) |
 |
| माहूर (रेणुकामाता) |
 |
 |
संर्पक |
| विनय क्षीरसागर |
| अ – 901, सागरदिप सोसायटी, |
| केळकर महाविद्यालयासमोर, मुलुंड- (पूर्व). |
| मुंबई- 400081. |
| घरचा दुरध्वनी क्रमांक : 25635378 |
|