| स्वप्नात येऊनि कथिते मज बोलविते |
| स्वप्नात येऊनि कथिते मज बोलविते |
| आठवतो लिहितो श्रेय तुला परि माने । |
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| मी अज्ञानि मज कशी स्फुरावी रचना |
| परि तुझ्या कृपेने करू शकलो स्तुति स्तवना |
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| हयातील दोष परि जे काही असतील |
| धनि मीच तयाचा, सार पहा तयातील |
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| स्तुति स्तवने यातिल पहा भाव मन्मनिचा |
| अनुसंधानाविन हेतु न मम हदयींचा |
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| मम ध्यानि मनी श्री जगदंबा जगजननी |
| चित्त चिंतनि वसते अंत:करणी |
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| आजवरि जे जीवन व्यर्थ फुका ते गेले |
| नामस्मरणाविण मी मौजेस्तव घालविले |
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| विनवणी तुझया पदि हीच असे जगदंबे |
| देणारच असशिल दे इतुके अविलंबे |
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| राहिला असे मम उर्वरीत जो काळ |
| तो तुझयाच स्मरणि जावो तिन्हि त्रिकाळ |
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| मज ऐहिक वैभव नको मान सन्मान |
| मोक्षही नको मज नकोच आत्मज्ञान |
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| मज नसेच वांछा सुरवात दिन जाण्याची |
| परि एकच इच्छा पुरवावी मन्मनिची |
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| मज पुर्नजन्म दे तुझयाच सेवेसाठी |
| साद्यंतच जावे जीवन ते तुझयासाठी |
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| पुजनि चिंतनी नामी तुझयाच रमावे |
| जगदंब दयाधन धवल तुझे यश गावे |
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| उत्तम काया आरोग्यासह स्त्री सुख सुत संपत्ति |
| उत्तम काया आरोग्यासह स्त्री सुख सुत संपत्ति |
| दिलेस तूं मज सारे का पदि जडे न माझी मती? |
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| जगदंबे मज सांग मला मी काय करावे यांसी? |
| रुप चिंतनी तुझे मनोहर का न येई ध्यानासी? |
| असे कसे मम मन हे वेडे तव पदि कानच रति? |
| दिलेस तूं मज सारे कां पदि जडे न माझी मती? |
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| पूजन भजनाचा कंटाळा दुरच स्मरणी नाम |
| आळस निद्रा यांतच गोडी आवडि सुख विश्राम |
| कसे न यांसी कळे न अजुनि स्वहित असे त्वत्पदि |
| दिलेस तूं मज सारे कां पदि जडे न माझी मती? |
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| तूंच करावि किमया काही वेडे मन सुधरावे |
| नित्य रमेल तुझ्या पद चिंतनी असेच काही करावे |
| तूंच आवरु शकसि त्याला विशाल त्याची गती |
| दिलेस तूं मज सारे का पदि जडे न माझी मती? |