| पूर्व संचिताविना न काहिच आणियले तूं बरोबरी |
| पूर्व संचिताविना न काहिच आणियले तूं बरोबरी |
| जातानांही हात मोकळे धरिसी कां रे हाव परि? |
| प्राप्त स्थितिचे स्वागत कर तूं चित्त ठेव आंनदी |
| सुखदु:खि मन अविचल असुं दे अंबा पदारविंदी |
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| हाव तुझी हव्यास येथला पूर्ण न होणे कधी |
| जाणुनिया समजावि मना जे नित्य असे स्वच्छंदी |
| लटक्या माया मोहबंधनी जीव भ्रमर हा बंदी |
| सुखदु:खि मन अविचल असु दे अंबा पदारबिंदी |
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| तुला मिळाले जे जे त्यातच मानि समाधान |
| होई स्थिती तुज प्राप्त, तीच नू प्रभु इच्छा जाण |
| कालक्रमणा करि आनंदे हताश हो नच कधी |
| सुखदु:खि मन अविचल असु दे अंबा पदारबिंदी |
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| हारजीत ही लटकी येथिल जीवन दोन घडीचे |
| कठपुतळी सम विश्वनात्य हे चालवि कर नियतीचे |
| चोख तुझं तूं काम करूनि तव, चित्त प्रभुचे वेधी |
| सुखदु:खि मन अविचल असु दे अंबा पदारबिंदी |
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| विसरुनि जा तूं हार प्रहारी हि नकोच त्याची खंत |
| नामस्मरणि रंगूनिया तूं विसर तुझे तूं स्वत्व |
| भक्ति वैभव असे मिळवे तूं, नकोच अन्य उपाधी |
| सुखदु:खि मन अविचल असु दे अंबा पदारबिंदी |
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| “कुटुंबियाचे दु:ख दैन्य दारिद्रय दूर झणि व्हावे । |
| “कुटुंबियाचे दु:ख दैन्य दारिद्रय दूर झणि व्हावे । |
| जगदंबेला माझ्यासाठी आपण हे सांगावे |
| हीच विनविण प्रिय शिष्याची ऐकावि गुरु देवे ।“ |
| हांसुनि वदति रामकष्ण “का जाईनास स्वये? |
| माय माऊली अति करुणामायि! निजसी तूं भेटावे |
| आजच जाईनास भेट तूं समक्ष तिज मागावे” |
| आतुरलेला नरेंद्र पाही वाट प्रहर रात्रीची |
| प्रवेश करिता मंदिरात मति गुंग जाहली त्याची |
| जगदंबेची मूर्त मनोहर सजीव साकारली |
| रुप संपदा कारूण्याची नयना समोर आली । |
| नमस्कारूनि पदारविंदा पहात राही नरेंद्र |
| विसरुनि गेला हेत मनिचा नेत्र होति प्रेमार्द्र! |
| जवळ घेऊनि जगनमाऊलि तयास मग कुरवाळे |
| “काय हवे ते माग! निश्चयें दिले तुला मी “बोले |
| “आई! मला तव घडले दर्शन हेच परम मम भाग्य! |
| दे मज ज्ञाना, विवेक, भक्ति आणिक ते वैराग्य!“ |
| परत फिरे मग शिष्य विचारी तयास गुरु अधिकारी |
| “पूर्ण जाहली ना तव इच्छा, माता प्रेमळ भारी!“ |
| “गुरुदेवा! मी खरोखरी मम हेतु बोललो नाही! |
| विसरुनि गेलो रुप पहाता प्रेममूर्त लवलाहि“ |
| पुन्हा पुन:पुन्हा हे असेंच घडले त्या रात्रीच त्रिवार |
| स्वामी विवेकानंद म्हणोनि प्रसिध्द होई नरेंद्र! |