| आवड नसे मनात |
| आवड नसे मनात |
| कसे मग येईल नाव मुखात? |
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| जन्मा आला प्रभु विसरला |
| मायाजाली बुडून गेला |
| घाव्याचा जणुबैलच झाला |
| स्मरण न करिसी ज्यानी तुजला धाडिले जगति |
| आवड नसे मनात, कसे मग येईल नाव मुखात |
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| बालपणा जणु विरुन गेला |
| तरुणापणा तो आला, सरला |
| प्रौढपणी बलहीन जाहला |
| प्रपंचओढा कमी न जाहला आसक्तीच मनात |
| आवड नसे मनात कसे मग येईल नाव मुखात |
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| आपत्काळी स्मरण प्रभुपदा |
| विसरुनि गेला सरता विपदा |
| पुन्हा सुरु मी पणा संपदा |
| यातच गेला पार गुंतुनि विषय सदा चित्तात |
| आवड नसे मनात, कसे मग येईल नाव मुखात |
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| अजून नाहि सरली वेळ |
| स्मरण करी तो आहे प्रेमळ |
| प्रभुपद सेवा होवो तवबल |
| आवड होता सवड होईल स्मरणशील प्रभु चित्त |
| उपजे गोडी मनात, सहज ये नाव नित्य चित्त |
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| दोन मनांचा झगडा चालु सदैव निजांतरात |
| दोन मनांचा झगडा चालु सदैव निजांतरात |
| वादविवादाची या चाहुल कधी न इतरा येत |
| एक मन असे सदवृत्तिचे वृत्ति असत ती दुजाची |
| न्याय देवता असे आंधळी ''बुदधि'' म्हणवि जी साची |
| असत वृत्तीचे सदैव म्हणणे “पाप पुण्य” हे झुट |
| आहे तोवर मजा करावी खाउनिया भरपेट |
| कसली आली नीतिबंधने? देवधर्म थोतांड'' |
| सदवत्ति परि सांग “ज्याने निर्मियले ब्रम्हांड |
| परमात्मा तो भरूनि राहि बघ अवघ्या विश्वात! |
| आनंदाने रहा जगी परि गुंतू नको तूं यात |
| कृतज्ञतेने स्मरण करी जी हदयातरि तव वास करी |
| सर्वसाक्षी जी विष्णुमाया जगदंबेचे स्मरण करी |
| कृती तुझी तुज सलते नंतर तेच असे रे पाप |
| पुण्यकर्म जे सुखवि इतरा स्वत:स जरि हो ताप |
| प्राप्त तुला नरजन्म जाहला जगदंबेला जवळ करी |
| नामें गेले पर्वत तरुनि प्रभु नामा ते वास करी” |
| एकुनि म्हणणे हया दोघांचे बुध्दि विचारी थिटी पडू |
| बुध्दिला ना कळला कधीच ईश म्हणुनि ती चांच पडे |
| निकष बुध्दिचा जिथे संपतो भाव तिथे तो सहज |
| भावानंतर भक्ती तेथे भगवंतासह ये अनुसरे |
| भक्तीसाठी आसन लागे ममताळु मन हदयाचे |
| प्रेम उपजता वाद संपति हदयि उदय हो अंबेचे |