| राग चंद्रकंस ताल नाटकी त्रिताल |
| तुझी मजवर ही कृपा केवढी। |
| लक्ष सतत गे सतत मजकडे |
| संकटि घेसी उडी। तुझी मजवर ही कृपा केव्हाढी |
| ऊनराई तव होऊ कसा मी जगदंबे शेवटी |
| तुझी मजवर ही कृपा केवढी। |
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| उत्तम कुळि मज जन्म दिला, तू ज्याची कुलदेवता |
| तव भक्तीचा आवड उपजे, सहज मनि सर्वथा |
| सुखदु:खि मम सांगाती तूं, रक्षियले घडि घडि |
| तुझी मजवर ही कृपा केवढी। |
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| तुझया कृपेने ऐहिक वैभव, धन सुख मी सेविले |
| मम सुत दुहिता कांतेसह तुज यथाशक्ती पुजिले |
| रंगुनि तव पदि, गेलो विसरुनि, मी मजला घडि घडि |
| तुझी मजवर ही कृपा केवढी। |
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| हे करुणामयि जगदीश्वरी तव प्रेम कसे आगळे? |
| कुपुत्र मजसम, मी नच लायक, तव प्रेमा, प्रेमले! |
| विश्वजननि तव अगाध लीला, वंदन तुज घडि घडि |
| तुझी मजवर ही कृपा केवढी। |
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| कलत्र तनया सुत आप्तावर, सतत कृपा ठेवणे |
| तव पदि स्थिर मति, दृढ भक्ती कर, हेच असे मागणे |
| अमृतदृष्टी सदा असावि, स्मरण घडो घडि घडि |
| तुझी मजवर ही कृपा केवढी। |
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| जेष्ठेसह ये गौरि कनिष्ठा प्रतिवर्षि भेटाया |
| जेष्ठेसह ये गौरि कनिष्ठा प्रतिवर्षि भेटाया |
| स्वागत करण्या वाद्ये वाजवु सुस्वर गजर करुया |
| बैठक सजवा सुरेख टाका भर्जरिचा गालिचा |
| पडदे लावा किनखापाचे ज्यास किनारीजरिच्या |
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| सुरेख रेखुनि रांगोळिही नक्षीदार दारात |
| सोनपाऊलि मिरवित आणा बहिणी दोघी घरात |
| जेष्ठा गौरि उभी कधीची मागिल दारात |
| पुढील दारी गौरि कनिष्ठा दिसे दिमाखात |
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| उंबरठयावर मधल्या दारी भेटतील हया बहिणी |
| माप उलथुनि विखरुनि जातिल तांदुळ मोत्यावाणी |
| सर्व घरातुनि मिरवित आणा दावा सर्व तयास |
| कृपाकटाक्षे सुखवैभवहि येईल विनाप्रयास |
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| परोपरि पक्वान्ने समर्पुनि नेवैद्याचे ताट |
| भावभक्तिच्या स्तुतिपाठासह करा पुजेचा थाट |
| वस्त्रभुषणे करा समर्पण खण नारळ ओटीत |
| करुनि प्रार्थना शरण पदि व्हा ईश्वरि भक्तांकित |
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| अवहेलुनि जेष्ठेस म्हणति जन नकोच ही अवदसा |
| लक्ष्मी पाठी मात्र धावती जिचा नसे भरवसा |
| खिन्न जाहली मनी कनिष्ठा पाहुनी तिची उपाक्षा |
| योग्य मिळावी जगी प्रतिष्ठा हीच मनात असे अपेक्षा |
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| प्रतिवर्षि मम बहिणीसह मज द्विरात्र जे पुजतिल |
| त्यावर कृपा करिन मी त्यांच्या विपदाही सरतील |
| यास्तव झाली रुढ प्रथा हे पूजन भाद्रपदात |
| रावरंकहि करिती पुजन प्रतिवर्ष सदनात |
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| श्रीमंती वा गरिबी येणे हे तर दैवाधीन |
| चित्ति असावि मन:शांति अन हृदयि समाधान |
| प्रतिवर्षाच्या पूजनातला आशय हाच असावा |
| सुखदु:खी मन अविचल राहो विसरन प्रभुचा व्हावा |