| असावी जगदंबा पदि आस |
| असावी जगदंबा पदि आस |
| जगदंबा पद सत्य निरंतर |
| अवघे विश्व अशाखत नश्वर |
| कसा तव त्यावर रे विश्वास? |
| अजुन तरि धर जगदंबा पदि आस |
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| दिसे भासते ते ते नश्वर |
| त्याचिच परि तुज हाव निरंतर |
| सुटे न तव हव्यास |
| अजुन तरि धर जगदंबा पदि आस |
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| कधी न संपे माझे माझे |
| व्यर्थ वागविसी अवघे ओझे |
| लीन पदि हो कर तिज अर्पण |
| संपव तव सायास |
| अजुन तरि धर जगदंबा पदि आस |
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| शांतविण्या तव मनिची तळमळ |
| उगाच हुरहुर हदय उताविळ |
| शरण तिला जा येईल मग बळ |
| हो भवपथ सुखद प्रवास |
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| यमधर्मा रे तुच तुझयासम निष्ठुर न्यायी महान |
| यमधर्मा रे तुच तुझयासम निष्ठुर न्यायी महान |
| कोणि तव करू न शके अवमान। |
| भाऊ तुझयासम यमराजा नच |
| त्रिभुवनि तुजविण अन्य न कोणिच |
| वेद पुराणे म्हणति असे वच |
| यमयमिसाठी “यमव्दितिया |
| भाऊबिज महान । कोणि तव करू न शके अवमान |
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| सृष्टिचे तू नियमन करिसी |
| सार्थ तुझे ’यम’ नाम मिरविसी |
| धर्मनीति तूं अचूक पाळिसी |
| संबोधुनि तुज ’धर्मराज यम’ |
| देव करिती सन्मान । कोणि तव करू न शके अवमान |
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| पापपुण्य तू सर्व तपासुनि |
| अंति जीवा नेसी प्रकटुनि |
| ’काळ’ तुला रे म्हणती कोणी |
| ’अंतक’ म्हणविसी प्राणहरही तव |
| आणिक नाममिधान । कोणि तव करु न शके अवभान |
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| ज्या जीवाचे आयु सरले |
| मरणपाशी तूं त्या गुंतविले |
| ’मृत्यु’ नामा यथार्थ केले |
| ’सूर्यपुत्र’ तूं वैस्वत तव |
| पिता असे भास्वान । कोणि तव करु न शके अवभान |
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| अनित्य या जगि नित तुं असशी |
| ’जीव’ श्रमे परि आशा पाशी. |
| बाल युवा अन वृध्द प्रवासी |
| स्वहित करावे अशी वृत्ती नच |
| खंत न, तव अवधान । कोणि तव करु न शके अवभान |
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| प्रभुचरणि जे तल्लीन झाले |
| नामस्मरणि रंगुनि गेले |
| जीवन अवघे प्रभुमय झाले |
| अशा जीवांना करुनि वंदन |
| हरिसी तयांचे प्राण । कोणि तव करु न शके अवभान |
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| जीव जन्मला ठरे मरण क्षण |
| कधी, कुठे, केव्हा? न कळे पण |
| यमराजा! मी मानीन तव ऋण |
| प्रभुस्मरण नज घडु दे अंति |
| इतुके दे वरदान । कोणि तव करु न शके अवभान |