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| अंबे! |
| अंबे! |
| निरंतर चिंतन तव घडु दे |
| सर्वस्थळि तव रूप मनोहर अंबे नित बघु दे। |
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| श्रवणि असावि तव यश गाथा |
| नेत्रि रुप तव पदि नत माथा |
| मनन करावे ध्यान तुझे नित |
| इतके मज तूं हे । |
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| अष्टभुंजाकित सुरम्य मुर्ति |
| कमलासनि सुख नयना दे ती |
| सुवर्णकुंडल दिप्ती मुखावर |
| अंतरि मम वसु दे |
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| तुझ्याच अर्चनि पुजनि भजनि |
| लक्ष असावे तव सम चरणि |
| याविन अन्य नको, तव स्मरणि |
| आवडि नित असु दे । |
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| जगदंबा पदकमलि मनोहर |
| जगदंबा पदकमलि मनोहर |
| सुवर्ण नुपूर पैंजण सुंदर |
| सुरेख नक्षि गौरपदावर |
| मैंदि अळिता रेखियला |
| दाखवि मज पदकमलाला । |
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| स्वर्ण तोरडया घुंगळवाळे |
| शोभवि तव शुभ पद वेल्हाळे |
| रत्न जोडवि मासोळि वळे |
| साज बोटि शोभे अतुला |
| दाखवि मज पदकमलाला । |
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| हयाच पदि सुखर नत झाले |
| रत्नमुकुट हया पदि किती झुकले |
| असुर सर्व भयव्याकुळ झाले |
| काळ तव रूपे रणि आला |
| दाखवि मज पदकमलाला । |
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| भक्त सर्व हया पदि आसुरले |
| तन्मय होउनि भान विसरले |
| स्वर्ग युक्तिहुनि हेच पद मले |
| म्हणति सार्थक जन्मचि झाला |
| दाखवि मज पदकमलाला । |
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| हया चरणांचे ध्यान निरंतर |
| मूर्त वसो मम हृदय पटावर |
| श्रवणि नित असो कीर्तन सुस्वर |
| ध्यास असा मज आर्त लागली |
| दाखवि मज पदकमलाला । |
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| कुलस्वामिनी अंबे तुजसम |
| कुलस्वामिनी अंबे तुजसम |
| तूच दयाळु महान |
| भगवति, दे मज इतुके दान। |
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| नकोच मजला ऐहिक वैभव |
| लौकिक नांव न मान मरातब |
| पूजन अर्चन पदसेवन तव |
| घडो सदोदित माझे कडुनि |
| सहज सुलभ नित छान |
| भगवति, दे मज इतुके दान। |
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| श्रवणि असावे तव स्तुतिपाठा |
| नयनि रुप तव चरणि माया |
| तव नामी मी रंगुनि जाता |
| विसरुनि जावे माझे मीपण |
| चित्ति वसो तव ध्यान |
| भगवति, दे मज इतुके दान। |
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| नित्य चिंतनि रुप असावे |
| नाम तुझे मज सहज स्फुरावे |
| तव गुण ध्यावे भावे गावे |
| असेच जावो अवघे जीवन |
| असो तुझा अभिमान |
| भगवति, दे मज इतुके दान। |
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| अपार हा भवसागर दुस्तर |
| अपार हा भवसागर दुस्तर |
| वृथा बाळगिसि याचे का भय? |
| सहजचि सुलभ उपाय |
| शरण जा, धरि जगदंबा पाय। |
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| सर्व चराचर मोहपसारा |
| जीव गुंतला त्यात बिचारा |
| कोण करिल मग भवपरिहारा? |
| खंबिरा अंबा माय |
| शरण जा, धरि जगदंबा पाय। |
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| शांतविण्या तव मनिची तळमळ |
| उगाच हुरहुर हदय उताविळ |
| खंत हरण करि तुझे मनोबळ |
| यास्तव सुलभ उपाय |
| शरण जा, धरि जगदंबा पाय। |
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| व्यर्थ करिसी का माझे माझे |
| टाकुनि दे पदि अवघे ओझे |
| शरण तिला जा मनि का लाजे? |
| हाच खराच उपाय |
| शरण जा धरि जगदंबा पाय। |
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| सोडी अहंता गर्व फुकाचा |
| नामस्मरणी रत हा साचा |
| शुध्द भाव परि ठेव मनीचा |
| कृपा न हो मग काय? |
| शरण जा, धरि जगदंबा पाय। |
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| शरण तिला जा कृतज्ञतेने |
| वश कर तिजला दृढभक्तिने |
| जीवन अवघे होईल सोने |
| कृपा करिल भवजाय |
| शरण जा, धरि जगदंबा पाय। |
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| एका जनार्दनी (Ebook) |
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संर्पक |
| विनय क्षीरसागर |
| अ – 901, सागरदिप सोसायटी, |
| केळकर महाविद्यालयासमोर, मुलुंड- (पूर्व). |
| मुंबई- 400081. |
| घरचा दुरध्वनी क्रमांक : 25635378 |
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