| पंचामृति अभिषेक श्रीवरि भल्या पहाटे केला |
| पंचामृति अभिषेक श्रीवरि भल्या पहाटे केला |
| यथासांग षोडषोपचारे पुजियले अंबेला |
| विविध परीचि फुले हार सप्रेमे अर्पण केले |
| धूपदीप नवैद्य दक्षिणा फल तांबुल हि दिधले |
| पंचारति ओवाळुनि घालु वारा मयुर पिसांनी |
| घंटेच्या तालावर आरति करू या एक सुरांनी |
| सबळ झांजा घंटानदि दुमहुमले मंदिर |
| मूर्तिमंत जणु भक्ति अवतरे घेऊनि विविधाकार |
| कर्पूराती घेऊनि घ्या हो चरणतीर्थ अंबेचे |
| प्रदक्षिणा लोटांगण घालुनि चरणि शरण व्हासाचे |
| स्तुति स्तवणे म्हणुया भावे शुध्दमनानी |
| भक्तिभाव पाहुनी प्रकटावि जगजननी |
| क्षणभरि विसरु प्रपंच तो व्यवहार |
| नामस्मरणि तल्लिन होता घडु दे साक्षात्कार |
| “उदयोगस्तु“ ने सुरू करावि आरति जगदंबेची |
| ज्ञानोदय हो तिच्या कपेने तीच माय जगताची |
| नवरात्रि जरि घडेल यापरि सेवा जगदंबेची |
| तुझी काळजि तिला, तुला नच चिंता भवतापाची |
| अगणित भक्ता आजवरि हा अनुभव असाच |
| सख्या मन्मना! दढभक्तिने वश कर जगदंबेस । |
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| जगंदब माऊलि मज दिसली स्वप्नात |
| जगंदब माऊलि मज दिसली स्वप्नात |
| ते रुप मनोहर ठसले मम हदयात ।। |
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| प्रेममयि-करूणा-लावण्याची पुतळी |
| सर्वांगि भूषण झळकत दिव्य झळाकी |
| शिरी किरीट कुंडले कस्तुरी कुंकम भाळी |
| आयुधे तळपति अष्टभुजाकमलात |
| ते रुप मनोहर ठसले मम हदयात ।। |
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| भर्जरी बुध्दीचा शालु हिरवागार |
| केशरि कंचुकी विलसत नक्षीदार |
| कटि रत्नमेखला हिरण्मय हार कंठी |
| शुभ सुर्वण पैंजण रुणझुणति चरणात |
| ते रुप मनोहर ठसले मम हदयात ।। |
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| ती सुहास्यवदना तेज नयनि रविशशिचे |
| वात्सल्य-प्रेम-लावण्य अखिल विश्वाचे |
| मी पाहियले हो रुप विश्वमाऊलिचे |
| पुलकित हो तनुही, प्रेमाश्रु नयनात |
| ते रुप मनोहर उसले मम हदयात ।। |
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| जागृति मला ये, गेले स्वप्न विरोनि |
| परिचित्र चिंतनि चित्ति दिसे तें अजुनि |
| जगदंब दयाघन! दे दर्शन मज फिरुनि |
| स्वप्नात दिले तरि - मानिन सौख्य तयात |
| ते रुप मनोहर ठसले मम हदयात ।। |
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